Thursday, March 19, 2009

टूटे ख्वाब

आज मेरे कुछ ख्वाब टूट गए
क्यूँ मैं जीता था इस उम्मीद में
कि मेरे ख्वाब में परियां होंगी
जबकि मेरे उम्मीद की कोई सतह ही नहीं

ख्वाब की परियों के पर नहीं होते
बिना किसी अपेक्षा के प्यार नहीं होता
होता नहीं बिना जीवनचक्र का कोई रिश्ता
सहारा कोई भी जीवन भर का नहीं होता

अब जी नहीं करता मेरा सोने को
वो ख्वाब बार बार वापस आते है
और सिर्फ नींद में ही नहीं
वो अब जागते हुए भी सताते हैं

अब मैं किसी ख्वाब में जीना नहीं चाहता
मरना भी नहीं मुझे किसी ख्वाब में
ना ही इंतजार करता हूँ उस पल का मैं
क्यूंकि हर पल उस इंतजार का बहुत ही दुखदाई है

1 comment:

  1. This may be as profound and may have the same plethora of emotions as always but it is sad to see the changed connotation this time around. Hope things get better soon. Good luck!

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