आज मेरे कुछ ख्वाब टूट गए
क्यूँ मैं जीता था इस उम्मीद में
कि मेरे ख्वाब में परियां होंगी
जबकि मेरे उम्मीद की कोई सतह ही नहीं
ख्वाब की परियों के पर नहीं होते
बिना किसी अपेक्षा के प्यार नहीं होता
होता नहीं बिना जीवनचक्र का कोई रिश्ता
सहारा कोई भी जीवन भर का नहीं होता
अब जी नहीं करता मेरा सोने को
वो ख्वाब बार बार वापस आते है
और सिर्फ नींद में ही नहीं
वो अब जागते हुए भी सताते हैं
अब मैं किसी ख्वाब में जीना नहीं चाहता
मरना भी नहीं मुझे किसी ख्वाब में
ना ही इंतजार करता हूँ उस पल का मैं
क्यूंकि हर पल उस इंतजार का बहुत ही दुखदाई है
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Thursday, March 19, 2009
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